शनिवार, 2 मई 2015

बिन तेरे कैसे है जीना

फेस बुक और व्हाट्स अप की दुनिया भी फीकी लगने लगी है , अब उस पर भी ना जाने क्यूँ दिल ही नहीं लगता , या बस कुछ दिनों से ये परेहानी बढ़ गई है दिलो दिमाग में एक अजीब सा खुमार है समझ नहीं आता दिल का दर्द किससे , कैसे और कहाँ बयाँ करूँ , तो याद आया की डेड दो वर्ष पहले जब में ठीक इसी तरह बुरे मानसिक खवाब से गुजर रहा था तो मुझे ये ब्लॉग ही अपना साथी लगता था यहीं अपने मन की बात लिखा करता था , तो आज भी जब चारों और कोई भी ऐसा दोस्त नहीं दिख रहा जिससे में अपने मन का दर्द सांझा कर सकूँ तो एक बार फिर अपने ब्लॉग अपनी डायरी की और लौटना पडा , आज तक जो बीता और जो जारी है बुरा दौर सब यही छपता जाएगा ...हो सकता है कभी मेरा समय आये और में काफी अच्छा हो जाऊं मेरी वीरान जिन्दगी गुलजार बन जाए तो उन बेदर्द लम्हों को इस खूबसूरत डायरी के माध्यम से निहारते हुए इस गली से निकलूंगा .................!!



संजय    

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